✍️✍️ वरिष्ठ अधिवक्ताओं की सशक्त बहस से गुंडा एक्ट पर लगा विराम, हाईकोर्ट की नज़ीर बनी निर्णायक आधार
गुंडा नियंत्रण अधिनियम के तहत की गई कार्यवाही को लेकर चल रहे एक महत्वपूर्ण प्रकरण में कानून की सूक्ष्म व्याख्या और प्रभावी अधिवक्ता–बहस का सशक्त उदाहरण सामने आया है। वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी एवं वरिष्ठ अधिवक्ता आशुतोष शुक्ला द्वारा की गई तथ्यपरक, विधि–सम्मत और विस्तृत बहस के बाद अपर पुलिस आयुक्त (कानून-व्यवस्था), कमिश्नरेट वाराणसी ने गुंडा एक्ट के अंतर्गत जारी नोटिस को निरस्त कर दिया।
👉 बहस के दौरान यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया कि मात्र दो आपराधिक मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को “गुंडा” की श्रेणी में रखना न तो अधिनियम की मूल भावना के अनुरूप है और न ही संवैधानिक सिद्धांतों के अनुकूल। वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद की प्रचलित न्यायिक नज़ीरों का हवाला देते हुए दलील दी कि ऐसे सीमित मामलों में गुंडा नियंत्रण अधिनियम का प्रयोग विधिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
👉 अपने आदेश में अपर पुलिस आयुक्त ने उच्च न्यायालय के एक निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल गिने-चुने मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध गुंडा एक्ट की कार्यवाही जारी रखना न्यायसंगत नहीं है। साथ ही यह भी पाया गया कि अधिनियम की धारा 2(ख) एवं धारा 3 के आवश्यक तत्व इस प्रकरण में पूर्ण नहीं होते।
👉 विधि विशेषज्ञों के अनुसार यह आदेश व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विधिक प्रक्रिया और निष्पक्ष प्रशासन के सिद्धांतों को पुनः स्थापित करता है। साथ ही, यह प्रशासन के लिए एक स्पष्ट संदेश भी देता है कि गुंडा एक्ट जैसे कठोर कानूनों का प्रयोग केवल ठोस, निरंतर एवं गंभीर आपराधिक गतिविधियों के ठोस आधार पर ही किया जाना चाहिए।

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