जिले में शिक्षा का अधिकार आज सवालों के घेरे में खड़ा है। एक ओर सरकार ‘सबको शिक्षा’ का नारा देती है, वहीं दूसरी ओर निजी स्कूलों की मनमानी ने आम और गरीब परिवारों की कमर तोड़ दी है। री-एडमिशन फीस, महंगी ड्रेस, तय दुकानों से किताबें और नोटबुक खरीदने का दबाव आदि। ये सब मिलकर शिक्षा को सेवा नहीं, बल्कि व्यापार बना रहे हैं।
👉 हर नए सत्र की शुरुआत माता-पिता के लिए किसी आर्थिक संकट से कम नहीं होती। स्कूलों द्वारा बार-बार “री-एडमिशन फीस” के नाम पर वसूली, बिना किसी स्पष्ट नियम के, पूरी तरह मनमानी प्रतीत होती है। सवाल उठता है कि जब बच्चा उसी स्कूल में पढ़ रहा है, तो हर साल दोबारा एडमिशन फीस क्यों?
👉 यही नहीं, ड्रेस और किताबों को लेकर भी अभिभावकों को मजबूर किया जाता है कि वे केवल तय दुकानों से ही खरीदारी करें, जहां कीमतें बाजार से कहीं अधिक होती हैं। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह बोझ असहनीय होता जा रहा है। कई प्रतिभाशाली बच्चे केवल आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। क्या यही है हमारे समाज का “टैलेंट मैनेजमेंट”?
👉 सबसे बड़ा सवाल प्रशासन की भूमिका पर उठता है। क्या जिले में कोई ऐसा तंत्र नहीं जो इन मनमानी पर लगाम लगा सके? शिक्षा विभाग की चुप्पी और कार्रवाई का अभाव स्कूलों को खुली छूट देता नजर आता है।
👉 जरूरत है सख्त नियमों और उनके ईमानदार पालन की। स्कूलों की फीस संरचना पारदर्शी हो, री-एडमिशन जैसी अनावश्यक वसूली पर रोक लगे, और किताबों-ड्रेस की खरीद में अभिभावकों को स्वतंत्रता मिले। तभी शिक्षा वास्तव में सबके लिए सुलभ हो पाएगी।
👉 अगर समय रहते इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया गया, तो न केवल हजारों बच्चों का भविष्य अंधकार में जाएगा, बल्कि समाज एक बड़े प्रतिभा-भंडार से भी वंचित रह जाएगा। अब वक्त है कि प्रशासन जागे और शिक्षा को व्यापार नहीं, अधिकार बनाए।
