✍️✍️ आय कर चोरी मामले में तीन आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज
वाराणसी के विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) कोर्ट ने लगभग चार दशक पुराने एक महत्वपूर्ण आय कर (इनकम टैक्स) चोरी के मामले में तीन आरोपियों द्वारा दाखिल अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश विकास श्रीवास्तव ने मामले की गंभीरता और आरोपियों के लंबे समय से न्यायालय में उपस्थित न होने को देखते हुए यह सख्त रुख अपनाया है।
""अदालत में अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र का विरोध वादी की ओर से वरिष्ठ फौजदारी अधिवक्ता नियाज अहमद खान ने किया""
क्या है पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 1986 का है।अभियोजन पक्ष के अनुसार, मैसर्स अब्दुर्रहमान एंड कंपनी के पार्टनर अब्दुल हई, अजीजुर्रहमान और हफीजुर्रहमान पर आरोप है कि उन्होंने असेसमेंट वर्ष 1982-83 के दौरान जानबूझकर अपनी व्यावसायिक आय और निवेश को छिपाया। आरोप है कि आरोपियों ने गलत रिटर्न दाखिल किया और इनकम टैक्स अथॉरिटी को गुमराह किया, जो इनकम टैक्स एक्ट 1961 की धारा 276सी, 277 और 278बी के तहत दंडनीय अपराध है।
आरोपियों का पक्ष और तर्क
आरोपियों के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि उन पर लगाए गए आरोप निराधार हैं और गलत असेसमेंट के आधार पर मुकदमा दर्ज किया गया है। बचाव पक्ष का कहना था कि मामले की मुख्य जानकारी रखने वाले अब्दुल रहमान की 27 वर्ष पूर्व मृत्यु हो चुकी है, जिसके कारण उन्हें अदालती कार्यवाही और प्रोसेस जारी होने की जानकारी नहीं मिल सकी। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके खिलाफ कोई टैक्स देनदारी नहीं बनती है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायालय ने पत्रावली के अवलोकन के बाद पाया कि आरोपी वर्ष 2014 से लगातार न्यायालय में अनुपस्थित हैं और उनके खिलाफ एनबीडब्ल्यू व सीआरपीसी की धारा 82 के तहत कार्यवाही चल रही है। न्यायालय ने एक मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि अग्रिम जमानत केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दी जा सकती है, जबकि यहां आरोपी लंबे समय से कानून की प्रक्रिया से दूर हैं।
न्यायाधीश विकास श्रीवास्तव ने सभी तथ्यों और आरोपों की प्रकृति को देखते हुए प्रार्थीगण अब्दुल हई, अजीजुर्रहमान और हफीजुर्रहमान की अग्रिम जमानत याचिका को निरस्त कर दिया है।
