✍️✍️ बनारस स्टेट की गद्दी-संपत्ति विवाद में प्रतिवादिनी को झटका, याचिका खारिज
""सिविल कोर्ट ने आदेश 7 नियम 11 के तहत दाखिल प्रार्थनापत्र किया निरस्त, डॉ. अनंत नारायण सिंह का मुकदमा साक्ष्य के आधार पर चलेगा""
वाराणसी। ऐतिहासिक बनारस स्टेट की गद्दी, रामनगर किला और नदेसर पैलेस समेत अन्य बहुमूल्य संपत्तियों के स्वामित्व को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद में वाराणसी की अदालत ने महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। अपर सिविल जज (सीनियर डिवीजन), कोर्ट संख्या-2 की न्यायाधीश नेहा सिंह ने प्रतिवादिनी संख्या-1 की ओर से वाद खारिज किए जाने के लिए दाखिल प्रार्थनापत्र संख्या 102-ग को निरस्त कर दिया। अदालत ने माना कि वादी का मुकदमा प्रारंभिक स्तर पर खारिज किए जाने योग्य नहीं है और अब मामले का निर्णय साक्ष्यों के आधार पर किया जाना है। अदालत में डॉ. अनंत नारायण सिंह की ओर अधिवक्ता सना सिंह ने पक्ष रखा।
मामला मूलवाद संख्या 1094/2024 (पुराना मूलवाद संख्या 1041/2011), डॉ. अनंत नारायण सिंह बनाम महाराजा कुमारी विष्णुप्रिया व अन्य से संबंधित है। वादी की ओर से बेदखली, स्थायी निषेधाज्ञा और क्षतिपूर्ति सहित विभिन्न अनुतोष मांगे गए हैं।
वादी डॉ. अनंत नारायण सिंह का दावा है कि वह स्वर्गीय महाराजा डॉ. विभूति नारायण सिंह के एकमात्र पुत्र हैं तथा प्राचीन ज्येष्ठाधिकार के सिद्धांत और बनारस स्टेट एवं भारत सरकार के बीच 5 सितंबर 1949 को हुए मर्जर एग्रीमेंट के आधार पर गद्दी तथा संबंधित संपत्तियों के एकल स्वामी एवं उत्तराधिकारी हैं। बता दे की वादी द्वारा वादपत्र के कथानक के समर्थन में सूची सबूत 7ग से नगर पालिका परिषद रामनगर वाराणसी के असेसमेंट रजिस्टर की सत्य प्रतिलिपि कागज संख्या 8ग, मर्जर एग्रीमेंट की छाया प्रति कागज संख्या 9ग, वसीयतनामा दिनांकित 10.11.2000 की छाया प्रति कागज संख्या 10ग एवं दाखिल खारिज असेसमेंट कागज संख्या 11ग प्रस्तुत किया गया है।
वहीं प्रतिवादिनी संख्या-1 की ओर से सीपीसी के आदेश 7 नियम 11 (क) एवं (घ) के तहत प्रार्थनापत्र प्रस्तुत कर वाद को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज करने की मांग की गई थी। प्रतिवादिनी का तर्क था कि वादपत्र में कोई स्पष्ट वाद-हेतुक नहीं बनता और विवाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 363 तथा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के प्रावधानों से बाधित है। यह भी दावा किया गया कि विवादित संपत्तियां संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति हैं तथा केवल ज्येष्ठता के आधार पर महिला उत्तराधिकारियों के अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते।
दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की दलीलें सुनने और प्रस्तुत शपथपत्रों एवं दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने कहा कि आदेश 7 नियम 11 के स्तर पर न्यायालय को मुख्य रूप से वादपत्र में किए गए कथनों को ही आधार बनाकर विचार करना होता है। प्रतिवादी के बचाव या आपत्तियों के आधार पर इस चरण में वाद की मेरिट का परीक्षण नहीं किया जा सकता।
अदालत ने उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए पाया कि वर्तमान मामले में वादपत्र से वाद-हेतुक स्पष्ट रूप से प्रकट होता है और ऐसा कोई स्पष्ट कानूनी प्रतिबंध सामने नहीं आता, जिसके आधार पर मुकदमे को प्रारंभिक स्तर पर ही समाप्त कर दिया जाए।
इस आधार पर अदालत ने प्रतिवादिनी का प्रार्थनापत्र 102-ग निरस्त कर दिया। साथ ही पत्रावली को आगामी साक्ष्य कार्यवाही के लिए 21 सितंबर 2026 को पेश करने का निर्देश दिया गया है। अब बनारस स्टेट की गद्दी और संबंधित संपत्तियों पर वास्तविक मालिकाना हक का प्रश्न मुकदमे की आगे की साक्ष्य एवं सुनवाई के बाद तय होगा।
