👉 लालसा एक ऐसी मिठी बीमारी है जिसमें इंसान चाँद तक पहुँचने का सपना देखता है, पर कम से कम अपने मोहल्ले की छत पर टेलीस्कोप जरूर लगाता है। यह इंसान को मेहनत करवाती है, पसीना बहवाती है और कभी-कभी हफ्तेभर नींद भी उड़वाती है। कह सकते हैं कि लालसा वह “शालीन इच्छाशक्ति” है, जो कहती है –
“भाई, तुम्हारे पास अभी एक बाइक है, ठीक है। लेकिन क्यों न मेहनत करके कल एक कार खरीद ली जाए?”
👉 वहीं लालच उस बदतमीज़ चाचा की तरह है जो बिना बुलाए हर पार्टी में पहुँच जाता है और जाते-जाते घर की मिठाई का डब्बा भी साथ ले जाता है। लालच कहता है –
“बाइक है? अरे छोड़ो, सामने वाले की बीएमडब्ल्यू कैसे हड़पी जाए, यही सोचो।”
👉 लालसा इंसान को दौड़ाता है, जबकि लालच दूसरों को धक्का देकर आगे बढ़ना सिखाता है। लालसा में पसीना शामिल है, पर लालच में सिर्फ़ पचास तरीक़े ढूँढने का हुनर कि बिना पसीना बहाए सब मिल जाए।
👉 हमारे देश की राजनीति से लेकर मोहल्ले के किराना स्टोर तक, हर जगह लालच का ही परचम फहरा रहा है। लालसा रखने वाला छात्र कहता है –
“मुझे टॉपर बनना है, चलो रातभर पढ़ाई करता हूँ।”
लेकिन लालच वाला छात्र कहता है –
“पढ़ाई छोड़ो, लीक हुए पेपर से काम चल जाएगा।”
अंतर साफ़ है—
लालसा इंसान को आगे ले जाती है,
और लालच इंसान को नीचे गिराता है (कभी जेल की सीढ़ियाँ उतरते हुए, कभी समाज की नज़रों में)।
👉 फिर भी लोग लालसा को भूलकर लालच को गले क्यों लगाते हैं? शायद इसलिए कि लालसा धैर्य माँगती है और लालच शॉर्टकट का वादा करता है। लोग भूल जाते हैं कि लालच का शॉर्टकट अक्सर खाई में जाकर ख़त्म होता है।
👉 तो प्यारे पाठको, अगली बार जब आपकी आत्मा कोई ख्वाहिश जगाए तो ध्यान से देखिए—
वो लालसा है जो आपको बेहतर इंसान बना रही है,
या लालच है जो आपको छोटा कर रहा है।
क्योंकि आखिरकार,
लालसा सपनों का जामुन है – मीठा और सुकून देने वाला।
लालच पेट का पेड़ है – जितना खा
ओ, उतना कड़वा होता जाता है।
