✍️✍️ Court acquits both accused in a high-profile 6-year-old murder case


✍️✍️ 6 साल पुराने हत्या के चर्चित मामले में कोर्ट ने दोनों आरोपियों को किया बरी

वाराणसी।

जिले के लालपुर-पाण्डेयपुर थाना क्षेत्र के हासिमपुर गांव में 2020 में सामने आए एक सनसनीखेज हत्याकांड में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश संध्या श्रीवास्तव ने अपना फैसला सुनाते हुए दोनों आरोपियों शीला राजभर और ललित राजभर को साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त करार दिया है।

""अदालत में आरोपी शीला राजभर की ओर से वरिष्ठ फौजदारी अधिवक्ता वीरेश्वर नाथ श्रीवास्तव व सहयोगी अधिवक्ता सौरभ साहनी, आनन्द कुमार सिंह, दिनेश कुमार पाण्डेय एवं विवेक कुमार पाण्डेय ने पक्ष रखा""

क्या था पूरा मामला?

घटना फरवरी 2020 की है, जब हासिमपुर निवासी ज्ञानचंद पटेल अचानक लापता हो गए थे। परिजनों द्वारा काफी खोजबीन के बाद 12 फरवरी 2020 को कैंट थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई गई थी। चार महीने बाद, 11 जून 2020 को वादिनी उर्मिला देवी ने पुलिस को सूचना दी कि उन्हें जानकारी मिली है कि शीला राजभर और ललित राजभर ने मिलकर ज्ञानचंद की हत्या कर दी है और शव को शीला के घर में बने लैट्रिन के सेप्टिक टैंक में छिपा दिया है। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर टैंक से एक मानव कंकाल बरामद किया था।

अभियोजन पक्ष के दावे

अभियोजन का तर्क था कि आरोपियों ने ज्ञानचंद की हत्या खल-बट्टे (आला-ए-कत्ल) से की थी।आरोपी ललित राजभर ने कथित तौर पर गवाहों के सामने न्यायिकेत्तर संस्वीकृति की थी। डीएनए जांच में खल-बट्टे पर मानव रक्त की पुष्टि हुई थी।

बचाव पक्ष की दलीलें

अदालत में बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने मजबूत दलीलें पेश कीं, जिन्हें न्यायालय ने भी संज्ञान में लिया:

  • पूरे मामले में कोई भी चश्मदीद गवाह नहीं था।
  • गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास पाया गया। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि कथित बरामदगी और गवाहों के बयानों में भारी विसंगतियां थीं।
  • न्यायालय ने माना कि बरामद कंकाल और मृतक के भाई के रक्त के नमूनों के डीएनए मिलान से कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका। यह साबित नहीं हो पाया कि वह खून ज्ञानचंद का ही था।
  • गुमशुदगी के चार महीने बाद बरामदगी हुई, जिस पर कोर्ट ने संदेहास्पद स्थिति बताई।

कोर्ट का निर्णय

न्यायाधीश संध्या श्रीवास्तव ने सभी पहलुओं और साक्ष्यों का बारीकी से अध्ययन किया। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष अभियुक्तों के खिलाफ आरोप को "संदेह से परे" साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी न होने और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के ठोस न होने के कारण, अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए दोनों अभियुक्तों शीला राजभर और ललित राजभर को दोषमुक्त कर दिया।

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