✍️✍️ Historical judgment of Varanasi POCSO Court: Juvenile tried as an 'adult' in the rape case of a 4-year-old innocent sentenced to 20 years of rigorous imprisonment


✍️✍️ वाराणसी पॉक्सो कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 4 वर्षीय मासूम से दुष्कर्म मामले में 'वयस्क' की तरह विचारित किशोर को 20 वर्ष का कठोर कारावास

वाराणसी। जनपद वाराणसी की विशेष पॉक्सो अदालत ने चार वर्षीय मासूम बच्ची से दुष्कर्म के जघन्य मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए किशोर न्याय अधिनियम के तहत 'वयस्क' की भांति विचारित किशोर अपचारी को 20 वर्ष के कठोर कारावास एवं 40 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया है। यह निर्णय विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) एवं अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश नितिन पाण्डेय की अदालत ने सुनाया।

यह मामला थाना लालपुर-पाण्डेयपुर क्षेत्र से संबंधित है। अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष लोक अभियोजक संतोष कुमार सिंह ने प्रभावी पैरवी करते हुए अभियुक्त के विरुद्ध सशक्त साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए।


टॉफी का लालच देकर सुनसान ऑटो में ले जाकर की वारदात

अभियोजन के अनुसार, पीड़िता के पिता ने 26 मार्च 2021 को थाना लालपुर-पाण्डेयपुर में तहरीर देकर बताया था कि उनकी चार वर्षीय पुत्री घर के बाहर खेल रही थी। इसी दौरान रिश्ते में चाचा लगने वाला 16 वर्षीय किशोर अपचारी उसे टॉफी दिलाने का झांसा देकर घर के समीप खड़े एक सुनसान ऑटो-रिक्शा में ले गया, जहां उसने मासूम के साथ दुष्कर्म किया। कुछ देर बाद बच्ची लहूलुहान अवस्था में रोते हुए घर पहुंची और दर्द से कराहते हुए अपने साथ हुई घटना की जानकारी परिजनों को दी।

किशोर न्याय बोर्ड ने माना था अपराध की गंभीरता समझने में सक्षम

मामले की प्रारंभिक जांच के दौरान किशोर न्याय बोर्ड (JJB) ने पाया कि किशोर अपचारी अपराध की प्रकृति, उसके परिणाम और दुष्परिणामों को समझने की पर्याप्त मानसिक एवं बौद्धिक क्षमता रखता था। इसी आधार पर बोर्ड ने उसे वयस्क की भांति विचारण हेतु बाल न्यायालय (पॉक्सो कोर्ट) को भेजने का आदेश दिया था।

छह महत्वपूर्ण गवाहों से सिद्ध हुआ अपराध

विशेष लोक अभियोजक संतोष कुमार सिंह ने न्यायालय के समक्ष पीड़िता के माता-पिता, चिकित्सक, विवेचक तथा एफआईआर लेखिका सहित कुल छह महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही कराई। चिकित्सीय साक्ष्यों एवं मौखिक साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय ने अभियोजन के आरोपों को संदेह से परे सिद्ध माना।

न्यायालय ने सुनाई 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा

न्यायालय ने अपने निर्णय में किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी किशोर को मृत्युदंड अथवा बिना रिहाई की संभावना वाले आजीवन कारावास से दंडित नहीं किया जा सकता। तथापि, चार वर्षीय मासूम के साथ किए गए अत्यंत जघन्य अपराध की गंभीरता को देखते हुए अधिकतम अनुमन्य दंड दिया जाना न्यायोचित है।

अदालत ने किशोर अपचारी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376AB तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(m)/6 के तहत दोषसिद्ध ठहराते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास एवं 40,000 रुपये के अर्थदंड से दंडित किया।

पीड़िता को मिलेगा प्रतिकर, पुनर्वास की भी व्यवस्था

न्यायालय ने निर्देश दिया कि अर्थदंड जमा कराने का दायित्व किशोर अपचारी के नैसर्गिक संरक्षक (माता-पिता) का होगा। जमा की गई धनराशि का 50 प्रतिशत अर्थात 20,000 रुपये पीड़िता को प्रतिकर के रूप में प्रदान किया जाएगा। साथ ही, किशोर के पुनर्वास के लिए जिला परिवीक्षा अधिकारी को व्यक्तिगत देखभाल योजना तैयार करने के निर्देश भी दिए गए हैं।


Post a Comment

Previous Post Next Post