✍️✍️ फर्जी वसीयत प्रकरण में बड़ा फैसला, 5 अभियुक्तों की अग्रिम जमानत खारिज
वाराणसी: दशाश्वमेध थाना क्षेत्र स्थित एक भवन के वंशीगली से जुड़े कथित फर्जी वसीयत, जालसाजी एवं धोखाधड़ी के मामले में अपर सत्र न्यायाधीश (कोर्ट संख्या-08) ने अभियुक्तों को बड़ा झटका देते हुए उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। अपर सत्र न्यायाधीश अमित कुमार तिवारी ने अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए अभियुक्त अशोक कुमार सिंह, विनय कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, सरोज सिंह एवं सविता सिंह को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
""अदालत में अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र का विरोध वादी की ओर से फौजदारी अधिवक्ता श्याम सुन्दर चौरसिया ने किया""
अभियोजन पक्ष एवं वादी ओम प्रकाश जायसवाल के अनुसार, भवन संख्या D-17/75 के मूल स्वामी स्वर्गीय शिशिर कुमार सेन थे, जिनका नाम नगर निगम वाराणसी के अभिलेखों में दर्ज था। उन्होंने 31 अक्टूबर 1973 को पंजीकृत वसीयत के माध्यम से यह संपत्ति कन्हाई लाल सिन्हा एवं गोपाल दास सिन्हा के नाम कर दी थी। 31 अगस्त 1981 को शिशिर कुमार सेन के निधन के बाद दोनों वसीयतधारी संपत्ति के स्वामी बने। बाद में गोपाल दास सिन्हा के निधन के पश्चात कन्हाई लाल सिन्हा एकमात्र स्वामी रहे। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी रीना सिन्हा तथा पुत्रियां संघमित्रा सिन्हा, संचिता सिन्हा एवं स्वागता सिन्हा उत्तराधिकारी बनीं। आरोप है कि वाराणसी में कम उपस्थिति का लाभ उठाकर किरायेदार रहे उदय नारायण सिंह (अभियुक्तों के पिता) एवं उनके वारिसों ने 28 जुलाई 1981 की कथित अपंजीकृत एवं फर्जी वसीयत तैयार कराकर वर्ष 1990 में नगर निगम के अभिलेखों में अपना नाम दर्ज करा लिया।
न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि मूल स्वामी शिशिर कुमार सेन ने वर्ष 1978 में उदय नारायण सिंह की बेदखली के लिए दीवानी वाद दायर किया था। 25 मार्च 1981 को सिविल न्यायालय ने उदय नारायण सिंह को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दिया था। इसके बावजूद अभियोजन का आरोप है कि बाद में कथित फर्जी वसीयत के आधार पर नगर निगम में नाम दर्ज कराया गया तथा वर्ष 2024 में स्वागता सिन्हा द्वारा संपत्ति का पंजीकृत विक्रय विलेख किए जाने के बाद कब्जा लेने पहुंचे खरीदारों के साथ मारपीट एवं जान से मारने की धमकी दी गई।अभियुक्तों पर भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 115(2), 351(2), 352, 319(2), 318(4), 336(3), 338 एवं 340(2) के तहत आरोप लगाए गए हैं।
अदालत ने अपने आदेश में उच्चतम न्यायालय के हालिया निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि अग्रिम जमानत कोई सामान्य अधिकार नहीं, बल्कि एक असाधारण राहत है, जिसे केवल विशेष परिस्थितियों में ही प्रदान किया जा सकता है। मामले की गंभीरता, अभिलेखीय साक्ष्यों की प्रथमदृष्टया मजबूती तथा आरोपों की प्रकृति को देखते हुए न्यायालय ने सभी अभियुक्तों की अग्रिम जमानत याचिका निरस्त कर दी।
