✍️✍️ दीवानी विवाद को आपराधिक रंग देने का प्रयास खारिज, वाराणसी कोर्ट ने परिवाद किया निरस्त
वाराणसी। संपत्ति विवाद को आपराधिक मुकदमे का रूप देकर न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लेने के मामले में वाराणसी की अदालत ने महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (कोर्ट संख्या-09), वाराणसी अमित कुमार यादव की अदालत ने परिवादी जितेन्द्र खण्डेलवाल द्वारा प्रस्तुत परिवाद को पर्याप्त आधार न मिलने पर निरस्त कर दिया। अदालत में फौजदारी अधिवक्ता संत सरन सेठ ने परिवाद का विरोध किया।
वसीयत और लीज डीड को लेकर था विवाद
परिवादी जितेन्द्र खण्डेलवाल ने एक मुकदमा में आशुतोष अग्रवाल, अश्विनी अग्रवाल और अमृत अग्रवाल के विरुद्ध धारा 226 बीएनएसएस के तहत परिवाद दाखिल किया था। परिवादी के अनुसार उनके बाबा स्व. द्वारिका नाथ खण्डेलवाल ने वर्ष 1993 में वसीयत के माध्यम से अपनी संपत्ति का बंटवारा किया था।
आरोप लगाया गया था कि अभियुक्तगण ने परिवादी के चाचा स्व. श्रीनाथ खण्डेलवाल की अधिक आयु और बीमारी का फायदा उठाते हुए, उनकी पत्नी की सहमति के बिना 26 जुलाई 2023 को पट्टा अनुबंध विलेख (लीज डीड) तैयार कराया और संपत्ति पर कब्जा करने का प्रयास किया।
अदालत ने माना विवाद मूलतः दीवानी प्रकृति का
अदालत ने पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों और बयानों का परीक्षण करने के बाद पाया कि विवाद का मूल केंद्र संपत्ति में हिस्सेदारी, वसीयत तथा लीज डीड की वैधता से जुड़ा है। ऐसे प्रश्नों का निर्धारण मूलतः दीवानी न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आता है।
अदालत ने परिवादी और उसके गवाहों पुत्र प्रणय खण्डेलवाल तथा नौकर पवन कुमार के बयानों में भी संपत्ति के स्वामित्व एवं कथित अवैध वसूली को लेकर विरोधाभास पाया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी लिया सहारा
न्यायालय ने अपने आदेश में उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए अदालत ने इस विधिक सिद्धांत पर गौर किया कि केवल दबाव बनाने अथवा दीवानी विवाद को आपराधिक मुकदमे का रूप देने के लिए आपराधिक न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।
किरायेदारों के कब्जे को लेकर भी अदालत की टिप्पणी
अदालत ने यह भी विचार किया कि विवादित संपत्ति पर पहले से किरायेदार काबिज हैं। ऐसे में केवल पट्टा विलेख के आधार पर मालिकाना अधिकार जताने अथवा किराया मांगने के आरोप को परिस्थितियों के आधार पर स्वतः आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।
परिवाद निरस्त
समस्त तथ्यों, साक्ष्यों, बयानों में पाए गए विरोधाभासों तथा उच्चतम न्यायालय के न्यायिक दृष्टांतों पर विचार करने के बाद अदालत ने परिवाद के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अमित कुमार यादव की अदालत ने परिवाद निरस्त करते हुए पत्रावली को नियमानुसार अभिलेखागार में दाखिल करने का आदेश दिया।
