उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम की जटिलताओं और दीवानी न्यायालय के क्षेत्राधिकार पर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए, वाराणसी के जिला जज संजीव शुक्ला ने 34 साल पुराने एक सिविल वाद की अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने व्यवस्था दी है कि यदि गांव में चकबंदी प्रक्रिया जारी है, तो भूमि के मालिकाना हक से जुड़े विवादों को तय करने का अधिकार केवल चकबंदी न्यायालय के पास है, सिविल कोर्ट के पास नहीं।
""अदालत में प्रतिवादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम कन्हैया यादव व सहयोगी अधिवक्ता विजय कुमार पाल, विष्णु कुमार सिंह,दीपक पाल ने पक्ष रखा""
मामले की पृष्ठभूमि: 1991 से चल रहा था विवाद
यह कानूनी विवाद ग्राम परमानन्दपुर (शिवपुर) स्थित आराजी संख्या 435 ग (पुरानी आराजी 197) से संबंधित है। मूल वाद संख्या 1042/1991 (श्यामलाल बनाम लल्लू) में वादी श्यामलाल सिंह और अन्य ने 1 जुलाई 1991 को प्रतिवादियों के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था।
वहीं, प्रतिवादी पक्ष (लल्लू राम आदि) का तर्क था कि गांव में 15 जून 1991 से ही चकबंदी की धारा 4 के तहत अधिसूचना जारी हो चुकी थी। अतः चकबंदी शुरू होने के बाद दीवानी न्यायालय में दाखिल यह वाद कानूनी रूप से चलने योग्य नहीं था।
कानूनी बहस: निषेधाज्ञा बनाम मालिकाना हक
मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं:
- 👉 अपीलकर्ता का तर्क: उन्होंने दावा किया कि यह मामला केवल 'निषेधाज्ञा' (रोकथाम) के लिए था, न कि मालिकाना हक की घोषणा के लिए। साथ ही, विवादित जमीन को चकबंदी प्रक्रिया से बाहर बताया गया।
- 👉 प्रतिवादी का तर्क: प्रतिवादियों ने 'बच्चू लाल बनाम राम सजीवन' मामले की नजीर देते हुए कहा कि निषेधाज्ञा देने के लिए भी अंततः मालिकाना हक (Title) का निर्धारण जरूरी है। चूंकि चकबंदी जारी थी, इसलिए धारा 49 चकबंदी अधिनियम के तहत सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र स्वतः समाप्त हो जाता है।
अदालतों का फैसला: धारा 49 का उल्लंघन
इससे पूर्व, सिविल जज (सीनियर डिवीजन) हितेश अग्रवाल ने 28 अक्टूबर 2025 को क्षेत्राधिकार के अभाव में इस वाद को निरस्त कर दिया था। इस आदेश को जिला जज की अदालत में चुनौती दी गई थी।
जिला जज संजीव शुक्ला ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए माना:
- पूर्ण प्रतिबंध: चूंकि मूल वाद चकबंदी अधिसूचना जारी होने के बाद दायर किया गया था, इसलिए यह उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम की धारा 49 के तहत पूरी तरह वर्जित है।
- चकबंदी विभाग की सर्वोपरिता: चकबंदी प्रक्रिया के दौरान रिकॉर्ड में सुधार या हक की घोषणा से जुड़े सभी अधिकार केवल चकबंदी अधिकारियों के पास होते हैं।
- अपील खारिज: जिला जज ने पाया कि अपील में कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है, जिसके बाद 20 जनवरी 2026 को इस 34 साल पुराने कानूनी संघर्ष पर विराम लगाते हुए अपील खारिज कर दी गई।
