आज के आधुनिक युग में जहाँ हम तकनीक और विकास की ऊंचाइयों को छू रहे हैं, वहीं समाज के दो सबसे पवित्र स्तंभ ""शिक्षा और चिकित्सा"" व्यावसायीकरण की भेंट चढ़ चुके हैं। कभी 'गुरु' को ईश्वर से ऊपर का दर्जा दिया जाता था, लेकिन आज शिक्षा जगत के कुछ हिस्सों में यह रिश्ता एक 'ग्राहक' और 'व्यापारी' के रूप में बदल गया है। शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि "धन उगाही" का एक संगठित खेल बन चुकी है।
लूट के नए हथकंडे: ज्ञान कम, ब्रांडिंग ज्यादा
वर्तमान समय में स्कूलों ने शिक्षा की गुणवत्ता से ज्यादा अपने 'मॉडल रूप' और 'दिखावे' पर ध्यान केंद्रित कर लिया है। अभिभावकों की जेब पर डाका डालने के लिए कई तरह के मनोवैज्ञानिक और प्रशासनिक दबाव बनाए जाते हैं:
- पुस्तकों और दुकानों का एकाधिकार: हर साल पाठ्यक्रम बदलने के नाम पर नई किताबें थोपी जाती हैं। इतना ही नहीं, स्कूलों द्वारा बाकायदा निर्देशित किया जाता है कि किताबें और स्टेशनरी किस विशेष दुकान से ही खरीदी जानी हैं। यह सीधा-सीधा कमीशनखोरी का खेल है।
- ब्रांडेड स्टेशनरी का दबाव: अब केवल किताबें ही नहीं, बल्कि कॉपियाँ भी विशिष्ट ब्रांड की ही होनी चाहिए। साधारण स्टेशनरी की जगह 'महंगी और ब्रांडेड' वस्तुओं की मांग ने गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर तोड़ दी है।
- री-एडमिशन का चक्रव्यूह: बच्चा उसी स्कूल में पढ़ रहा है, कक्षाएं बदल रही हैं, लेकिन 'री-एडमिशन' के नाम पर हर साल मोटी रकम वसूली जाती है। यह न केवल अनैतिक है, बल्कि शिक्षा के अधिकार की मूल भावना के खिलाफ भी है।
- ड्रेस कोड का दिखावा: साल में कई तरह की यूनिफॉर्म (रेगुलर, स्पोर्ट्स, हाउस ड्रेस) और उनके लिए भी निर्धारित वेंडर तय करना, स्कूल प्रबंधन की कमाई का एक मुख्य जरिया बन गया है।
अभिभावकों की लाचारी और बच्चों का भविष्य
एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार, जिसके घर में दो या तीन बच्चे हैं, उसके लिए आज के दौर में अच्छी शिक्षा एक "दुःस्वप्न" बनती जा रही है। महंगाई के इस दौर में माता-पिता अपनी बुनियादी जरूरतों को काटकर बच्चों की फीस और इन फिजूलखर्ची वाली मांगों को पूरा करते हैं।
जब एक अभिभावक अपने बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए स्कूल में नाम लिखवाता है, तो वह उम्मीद करता है कि उसे ज्ञान मिलेगा। लेकिन जब उसे किताबों, जूतों और कॉपियों के ब्रांड के लिए मजबूर किया जाता है, तो वह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि क्या वह अपने बच्चों को आगे पढ़ा पाएगा? यह स्थिति समाज में शैक्षिक असमानता को जन्म दे रही है।
कहाँ है शासन और प्रशासन?
यह सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल है। क्या कोई अधिकारी, शासन या प्रशासन है जो इन बेलगाम स्कूलों पर नकेल कस सके?
- नियमों का अभाव या अनदेखी: हालांकि कागजों पर कई नियम हैं कि स्कूल किसी खास दुकान से सामान खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकते, लेकिन धरातल पर इनकी निगरानी शून्य है।
- फीस नियामक समिति की विफलता: कई राज्यों में फीस कंट्रोल कमिटी होने के बावजूद, स्कूल 'विविध शुल्क' (Miscellaneous Charges) के नाम पर लूट जारी रखते हैं।
- साठगांठ का संदेह: प्रशासन की चुप्पी अक्सर यह संदेश देती है कि कहीं न कहीं रसूखदार स्कूल प्रबंधन और अधिकारियों के बीच मौन सहमति है।
बदलाव की जरूरत
शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण और ज्ञान का प्रसार होना चाहिए, न कि बैलेंस शीट सुधारना। यदि समय रहते सरकार और समाज ने इस "धन उगाही" के खिलाफ आवाज नहीं उठाई, तो आने वाली पीढ़ियां केवल डिग्रीधारी मशीनें बनेंगी, जिनके पास ज्ञान तो होगा लेकिन उनके माता-पिता के पास खोई हुई गरिमा और खाली जेबें।
शासन से अपेक्षा है कि:
- स्कूलों में हर साल किताबें बदलने पर पूर्ण प्रतिबंध लगे।
- एनसीईआरटी (NCERT) की किताबों को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।
- किसी भी विशेष दुकान से खरीदारी की बाध्यता को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए।
👉👉 समाज को भी जागना होगा। शिक्षा को व्यापार बनने से रोकना केवल सरकार की नहीं, हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।

