✍️✍️ "Accused acquitted in 15-year-old police encounter case; court raises serious questions on the investigation"


✍️✍️ 15 साल पुराने पुलिस मुठभेड़ मामले में आरोपी दोषमुक्त, कोर्ट ने उठाए जांच पर गंभीर सवाल

वाराणसी।

शहर के कैंट थाना क्षेत्र में वर्ष 2011 में हुई एक कथित पुलिस मुठभेड़ और अवैध हथियारों की बरामदगी के मामले में वाराणसी की द्रुतगामी न्यायालय (प्रथम) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी सुशील सिंह को सभी आरोपों से दोषमुक्त करार दिया है। पीठासीन अधिकारी अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश कुलदीप सिंह (द्वितीय) ने अपने 16 पेज के विस्तृत निर्णय में अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में भारी खामियां पाईं और पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े किए।

""अदालत में बचाव पक्ष की ओर से फौजदारी अधिवक्ता वीरेश्वर नाथ श्रीवास्तव व सौरभ साहनी ने पक्ष रखा""

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष की कहानी के अनुसार, दिनांक 01.09.2011 को कैंट पुलिस को सूचना मिली थी कि अभिषेक सिंह उर्फ हनी गैंग के सदस्य चोरी की मोटरसाइकिल पर सवार होकर किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने के लिए सेंट्रल जेल रोड, सिकरौल की तरफ आ रहे हैं। पुलिस का दावा था कि घेराबंदी करने पर बदमाशों ने पुलिस पर जान से मारने की नीयत से फायरिंग की, जिसके जवाब में आत्मरक्षार्थ पुलिस ने भी फायर किया। इस मुठभेड़ में सुशील सिंह और कल्लू उर्फ धर्मेंद्र पाण्डेय को गिरफ्तार करने और उनके पास से अवैध पिस्टल, तमंचे और चोरी की मोटरसाइकिल बरामद करने का दावा किया गया था।


बचाव पक्ष और न्यायालय का अवलोकन

मुकदमे के दौरान अभियुक्त सुशील सिंह ने खुद को निर्दोष बताते हुए आरोपों को पूरी तरह से मनगढ़ंत बताया। बचाव पक्ष के विद्वान अधिवक्ता ने दलील दी कि:

 1. पुलिस ने न तो सरकारी जीप का पंजीयन विवरण दिया और न ही रवानगी की कोई ठोस जी.डी. पेश की।

 2. घटनास्थल भीड़भाड़ वाला इलाका था, लेकिन पुलिस ने किसी भी स्वतंत्र गवाह को साक्ष्य के लिए प्रस्तुत नहीं किया।

 3. बरामद मोटरसाइकिल चोरी की थी, इसे अभियोजन साबित नहीं कर सका।

 4. घटनास्थल से कोई खोखा (कारतूस का खोल) बरामद नहीं हुआ, जो फायरिंग की थ्योरी को कमजोर करता है।


कोर्ट ने अपने निर्णय में क्या कहा?

अदालत ने माननीय उच्चतम न्यायालय के विभिन्न न्याय दृष्टांतों का हवाला देते हुए दोहराया कि "आपराधिक न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत है कि आरोपी का दोष संदेह से परे प्रमाणित होना चाहिए।"

न्यायालय ने अपने निर्णय में पाया कि:

  •  साक्ष्यों में विरोधाभास: नक्शा नजरी (घटनास्थल का नक्शा) और पुलिस द्वारा प्रस्तुत बयानों में तालमेल का अभाव था।
  •  जांच में शिथिलता: पुलिस ने न तो घटनास्थल के खोखों को बरामद किया और न ही बरामद हथियारों की विधि विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) से जांच रिपोर्ट पत्रावली पर प्रस्तुत की।
  •  संदेह का लाभ: अभियोजन पक्ष इन विसंगतियों के कारण अभियुक्त के विरुद्ध लगे आरोपों (धारा 307, 41/411/414) को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।

अंतिम आदेश

अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपी सुशील सिंह को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। इस मामले में सह-अभियुक्त कल्लू उर्फ धर्मेंद्र पाण्डेय की पूर्व में मृत्यु हो जाने के कारण उनके विरुद्ध कार्यवाही पहले ही उपशमित की जा चुकी थी।

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