✍️✍️ 33-Year-Old Dispute: Court Acquits 'Leader' as Medical Evidence Disappears and Statements Contradict

 


✍️✍️ 33 साल पुराना विवाद: मेडिकल साक्ष्य गायब और बयानों में विरोधाभास, कोर्ट ने 'नेता' को किया बाइज्जत बरी

""गवाहों के बयानों में अंतर और जनता की अनुपस्थिति के चलते एस०सी०/एस०टी० एक्ट का मामला खारिज""

वाराणसी:

स्थानीय जनपद न्यायालय के विशेष न्यायाधीश (एस०सी०/एस०टी० एक्ट) सुधाकर राय की अदालत ने करीब 33 साल पुराने एक चर्चित मामले में अपना अंतिम फैसला सुना दिया है। अदालत ने भोजूबीर निवासी अभियुक्त सिद्धार्थ कुमार यादव (नेता) को संदेह का लाभ देते हुए उनके खिलाफ दर्ज सभी संगीन धाराओं से बाइज्जत दोषमुक्त (बरी) कर दिया है। यह मामला साल 1993 से चला आ रहा था, जिसमें लंबे विचारण और कानूनी दांव-पेंच के बाद आखिरकार फैसला आया है। 

""अदालत में बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ फौजदारी अधिवक्ता अजय गेठे ने पक्ष रखा""


क्या था पूरा मामला?

अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 27 फरवरी 1993 की रात करीब 10:30 बजे की बताई गई थी। वादी भाऊ सोनकर (चन्द) ने आरोप लगाया था कि जब वह भोजूबीर स्थित शराब की दुकान के पास पहुंचे, तो अभियुक्त सिद्धार्थ कुमार यादव ने उनसे शराब पीने के लिए पैसे मांगे। पैसे देने से मना करने पर अभियुक्त ने उन्हें जातिसूचक गालियां दीं, जमीन पर पटक दिया और दांत से नाक व हाथ पर काट लिया। साथ ही ईंट से मारकर सिर पर गंभीर चोट पहुंचाई। पुलिस ने इस शिकायत पर कैंट थाने में मुकदमा दर्ज किया था। 


3 मुख्य वजहों से ढह गया अभियोजन का किला

अदालत ने पत्रावली और साक्ष्यों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह असफल रहा। फैसले के मुख्य बिंदु इस प्रकार रहे:

  • १. मेडिकल रिपोर्ट निकली संदिग्ध: वादी ने दावा किया था कि उसे गंभीर चोटें आईं और उसका मेडिकल कराया गया। लेकिन अस्पताल के आधिकारिक 'मेडिकोलीगल रजिस्टर' की जांच करने पर उस तारीख में वादी के नाम का कोई अंकन ही नहीं मिला। डॉक्टर की मृत्यु के बाद पेश हुए द्वितीयक गवाह भी मेडिकल साबित नहीं कर सके।  
  • २. बयानों में भारी विरोधाभास: मुख्य गवाह और वादी ने मुख्य परीक्षा में घटना का समय रात 10:30 बजे बताया, जबकि जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के दौरान उसने घटना का समय 8:30 बजे बता दिया। समय का यह अंतर केस को कमजोर कर गया।  
  • ३. एस०सी०/एस०टी० एक्ट की धारा लागू न होना: अदालत ने उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की विधि व्यवस्थाओं (नजीर) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि इस धारा के तहत अपराध के लिए घटना का 'जनता के दृष्टिगोचर' (सार्वजनिक रूप से लोगों के सामने) होना जरूरी है। वादी ने खुद स्वीकार किया कि घटना के समय वहां कोई अन्य व्यक्ति मौजूद नहीं था। साथ ही, यह विवाद पैसे के लेन-देन को लेकर था, न कि साशय जाति के कारण अपमानित करने के लिए।  


बचाव पक्ष की दलील

अभियुक्त के अधिवक्ता ने अदालत में यह भी तर्क दिया था कि अभियुक्त पैर से विकलांग (लकवाग्रस्त) है, जिसके कारण उसके लिए ऐसी घटना कारित करना शारीरिक रूप से संभव नहीं था।

  

अदालत का अंतिम आदेश

विशेष न्यायाधीश सुधाकर राय ने आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांत 'संदेह का लाभ अभियुक्त को मिलना चाहिए' के आधार पर सिद्धार्थ कुमार यादव को धारा 323, 504, 506 भा०दं०सं० और धारा 3(1)(x) एस०सी०/एस०टी० एक्ट के आरोपों से पूरी तरह दोषमुक्त कर दिया।

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