✍️✍️ Court grants anticipatory bail to accused in fake friend online fraud case


✍️✍️ फर्जी मित्र बन ऑनलाइन ठगी करने वाले आरोपी को कोर्ट से मिली अग्रिम जमानत

""PhonePe पर ₹99 हजार की साइबर ठगी का मामला; लकवाग्रस्त होने व साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने दी सशर्त राहत""

वाराणसी: फर्जी मित्र बनकर फोन पे के जरिए ₹99,000 की साइबर ठगी करने के मामले में सत्र न्यायाधीश, वाराणसी की अदालत ने आरोपी लालचन्द्र को सशर्त अग्रिम जमानत प्रदान कर दी है। न्यायालय ने आरोपी के गंभीर रूप से बीमार (लकवाग्रस्त) होने, अनपढ़ होने तथा पूर्व में कोई आपराधिक इतिहास न होने के तर्कों पर विचार करते हुए 50 हजार रुपये के व्यक्तिगत बंधपत्र और दो जमानतदारों की शर्त पर यह आदेश दिया।

""अदालत में बचाव पक्ष की ओर से फौजदारी अधिवक्ता नदीम अहमद खां, रजनीश सिंह व दीपक कुमार ने पक्ष रखा""

घटना का विवरण: लिंक भेजकर 7 बार में उड़ाए पैसे

मामला मण्डुवाडीह थाना क्षेत्र का है।

  •  पीड़ित: नरसंह नारायण मिश्रा (खाताधारी: ICICI बैंक, लंका शाखा, वाराणसी)।
  •  घटना: 18 फरवरी 2022 को सुबह लगभग 10:30 बजे पीड़ित के मोबाइल पर एक अज्ञात नंबर से कॉल आया।
  •  झांसा: फोन करने वाले ने खुद को पीड़ित का मित्र 'आलम' बताया और कहा कि वह उनके खाते में ₹25,000 भेज रहा है, जिसे वे उसकी बेटी को हस्तांतरित कर दें।
  • ठगी: पैसा ट्रांसफर करने के बहाने आरोपी ने एक लिंक भेजा। जैसे ही पीड़ित ने प्रक्रिया पूरी की, उनके खाते से कुल 7 किस्तों में ₹99,000 कट गए।
  •  शिकायत के आधार पर अज्ञात के खिलाफ धारा 420 IPC और 66D IT Act के तहत मामला दर्ज किया था।

बचाव पक्ष की दलीलें

आरोपी लालचन्द्र (निवासी: मादीपुर / नांगलोई, वेस्ट दिल्ली) की ओर से अग्रिम जमानत याचिका प्रस्तुत करते हुए विद्वान अधिवक्ता ने तर्क दिया कि आरोपी एफआईआर में नामजद नहीं था, जांच के दौरान उसका नाम सामने लाया गया है। आरोपी अनपढ़ है और पिछले एक साल से लकवा से ग्रस्त है। पुलिस का दावा था कि फेडरल बैंक के खाते में रुपये गए हैं, जबकि आरोपी का ऐसा कोई खाता ही नहीं है. आरोपी का पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह विवेचना में सहयोग करने को तैयार है।

अभियोजन पक्ष का विरोध व कोर्ट का फैसला

अभियोजन पक्ष (जिला शासकीय अधिवक्ता, फौजदारी) ने जमानत का तीव्र विरोध करते हुए कहा कि वादी के खाते से फ्रॉड ट्रांजैक्शन कर 99 हजार रुपये निकाले गए हैं। वित्तीय अपराधों की गंभीरता को देखते हुए अग्रिम जमानत निरस्त की जानी चाहिए। दोनों पक्षों की दलीलें व साक्ष्यों का अनुशीलन करने के बाद सत्र न्यायाधीश ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को स्वीकार करते हुए अग्रिम जमानत दे दिया।

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